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PRAYER

प्रार्थना क्या है और क्यों करते हैं

भगवान के लिए हमारी प्रार्थना के परिणाम के बारे में मिश्रित भावनायेँ या निष्कर्ष हो सकते हैं। कभी-कभी भगवान किसी व्यक्ति की प्रार्थना का जवाब देते हैं और कभी-कभी वह नहीं भी देते। इस प्रश्न का उत्तर हाँ अथवा ना में हो सकता है अतः इसका विश्लेषण आवश्यक है।

हम प्रार्थना क्यों करते हैं?

हमारे उद्देश्यों में सांसारिक उद्देश्य (परिवार, स्वास्थ्य, धन, प्रसिद्धि, वगैरह) प्राप्त करने से लेकर, हमें दु:ख पहुंचाने वाले के लिए बद-दुआ हो सकती हैं। इसके अलावा, हम कुछ इच्छाओं के लिए प्रार्थना कर सकते हैं जो ईर्ष्या से या प्रतिद्वंद्विता के कारण हमारे मन में उत्पन्न होती हैं।

हमारे पास जो कुछ धन-संपदा है उसे खोने का डर भी हो सकता है, इसलिए हम इसके विकास के लिए प्रार्थना करते हैं या कम से कम हमारे पास जो है वह बना रहे।

वास्तव में, पसंद, नापसंद, इच्छायेँ, महत्वाकांक्षायेँ वगैरह में कोई अंतर नहीं है, क्योंकि उनके मूल में लगाव और घृणा छिपे हैं। हालांकि, मैंने अपने जीवन में कुछ चीजों की इच्छा नहीं की, फिर भी मेरी भलाई के लिए आवश्यक इच्छाएँ पूरी हुईं। क्या इसका मतलब यह है कि हमें किसी भी चीज़ के लिए प्रार्थना नहीं करनी चाहिए और हमारे प्रयासों से जो कुछ भी मिलता है उसे स्वीकार करना चाहिए?

यदि हम ज्योतिष को मानते हैं, तो पता लगता है कि जन्म से पहले जीवन के कर्म फलों के आधार पर इस जीवन की राह पहले ही निश्चित हो चुकी है। परन्तु कर्म करने की स्वतंत्रता के कारण दंडित व्यक्ति का सच्चरित्र होने तथा धर्मी का पतन संभव है। यह माना जाता है कि मनुष्य के अलावा अन्य किसी प्रजाति को ऐसी स्वतंत्रता नहीं है। यह तो मनुष्य ही है जो कभी अपनी स्थिति से संतुष्ट नहीं होता है और एक ज्योतिषी से अपनी पीड़ा कम करने के लिए या वांछित परिणाम प्राप्त करने हेतु सलाह लेता है।

अगर कोई बरबादी की दशा में भगवान के चरणों का आश्रय लेता है, या उसकी दया पर सब कुछ छोड़ देता है, तो संतों ने स्थिति सुधरने का भरोसा दिलाया है| इस भलाई को भौतिक वस्तुओं और महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के रूप में नहीं मापा जाना चाहिए, बल्कि जो मन की शांति या आध्यात्मिकता में जो प्राप्त होता है उससे मापना चाहिए।

भगवान से प्रार्थना कहां की जाये?

संतों के मुताबिक किसी विशिष्ट स्थान पर प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं है या इसे अनुष्ठानपूर्वक किया जाये। एक प्रसिद्ध कथा नीचे दी गई है:-

एक भक्त का नाम-स्मरण इतना पक्का हो गया था कि उसके मन में यह हमेशा चलता रहता था। वह मल त्याग करते समय भी भगवान को याद कर रहा था। भगवान के एक वफादार सहयोगी ने यह देखा। उसने इस तरह के गंदे स्थान में प्रार्थना करने के लिए उसकी कमर में लात मारी और चला गया। इसके बाद वह स्वर्ग में भगवान से मिला और देखा कि भगवान दर्द के कारण कराह रहे हैं। सहयोगी द्वारा कारण पूछने पर भगवान ने उत्तर दिया: “आपने मुझे याद करते हुए भक्त को जो लात मारी थी उसी का यह दर्द सहन कर रहा हूँ। जहां भी कोई भक्त मुझे किसी भी स्थिति या मनोदशा में निष्ठापूर्वक याद करता है, मैं उसके दिल में रहता हूँ और उसका दर्द महसूस करता हूँ।

क्या है प्रार्थना का अर्थ?

प्रार्थना का असली अर्थ है – “धन्यवाद देना”, ईश्वर ने आपको जो कुछ दिया है और वर्तमान में जो कुछ आपके पास है उसके लिए आपको ईश्वर का धन्यवाद देना चाहिए, यही असली प्रार्थना है|

मंदिर जाकर हाथ जोड़कर ईश्वर से कुछ मांगना, यह तो याचना है, प्रार्थना नहीं| प्रार्थना करते समय आप उस ईश्वर का स्मरण करते हैं और उसका धन्यवाद देते हैं जिसने आपको यह सुन्दर जीवन दिया है|

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